खरी-अखरी : भारत को सिर्फ और सिर्फ भारत की राजनीति हांक रही है
भारत को सिर्फ और सिर्फ भारत की राजनीति हांक रही है
आखिर कौन सी परिस्थितियां हैं जहां छोटे-छोटे राजनीतिक स्वार्थ बड़े-बड़े राजनीतिक निर्णय लेने से रोक देती है ? पीछे हटने की परिस्थितियां कैसे बन रही हैं ? जिस दिन इन परिस्थितियों पर विपक्ष काबू पा लेगा दिल्ली से लेकर कई बड़े राज्यों में सत्ता परिवर्तन होने की शुरुआत होने लगेगी। लेकिन सत्ता परिवर्तन से पहले व्यवस्था परिवर्तन की बात सैध्दांतिक तौर पर जाकर टिक जाती है और यह एक मृग मरीचिका सी लगती है। आखिर लोकतांत्रिक तरीके से जहां परिवर्तन सत्ता के सहारे ही होता है वहां सत्ता परिवर्तन की बात को पीछे छोड़ कर और सीधे-सीधे व्यवस्था परिवर्तन की बात करने वाले दलों को आखिर जनता कब तक ऐसे ढोती रहेगी ? पुणे और नागपुर को छोड़ दें तो शेष महाराष्ट्र से निकलने वाला संदेश तो यही है कि जनता भारतीय जनता पार्टी से छुटकारा चाहती है लेकिन क्या विपक्ष उसे बनाये रखना चाहता है ? क्योंकि संदेश तो यह भी है कि लोकसभा चुनाव की तरह अगर महा विकास आघाड़ी के दलों ने एक साथ चुनाव लड़ा होता तो तस्वीर दूसरी होती। महाराष्ट्र की जनता ने अपना फैसला सुना दिया। मुंबई की जनता ने अपना फैसला सुना दिया। मुंबई का संदेश महाराष्ट्र के साथ ही पूरे देश के लिए भी है। दिल्ली और मुंबई एक ही पायदान पर खड़े हो गए हैं यानी जैसे दिल्ली बैसाखी के सहारे चल रही है वैसे ही बैसाखी के सहारे मुंबई को चलना होगा। महाराष्ट्र ने बीजेपी को बता दिया है कि वह गुजरात नहीं है तथा मुंबई भी अहमदाबाद और गांधीनगर नहीं है। मुंबई का परिणाम ठाकरे परिवार की चूक है। मुंबई में भले ही ओबीसी फैक्टर सिंगल डिजिट में दिख रहा है लेकिन दूसरे हिस्सों में ओबीसी फैक्टर शतक लगाने के करीब है। बीजेपी जानती है कि अल्पसंख्यक वोटर उससे छिटकता है तो वह कहीं विपक्ष के साथ ना खड़ा हो जाय इसलिए ओवैसी हैदराबादी दायरे से बाहर निकल कर देश के राज्य दर राज्य दिखाई देते हैं और अपरोक्ष रूप से बीजेपी को संजीवनी देते रहते हैं। इंडिया गठबंधन का क्षेत्रीय स्वरूप महा विकास आघाड़ी नगरीय निकाय चुनाव में बिखरा रहा लेकिन एनडीए का क्षेत्रीय स्वरूप महायुति संगठित बना रहा। जहां ठाकरे बंधु बरसों बाद साथ चुनाव लड़े वहीं कांग्रेस वंचित बहुजन आघाड़ी के साथ खड़ी थी। एनसीपी ने भी अपनी अलग राह पकड़ी थी।
लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस व्यवहारिक राजनीति से दूरी बनाते हुए विशुद्ध रूप से आईडियोलाजी यानी सैध्दांतिक यानी विचारधारात्मक राजनीति के रास्ते पर चल रही है। जबकि एक समय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों ने सैध्दांतिक राजनीति को व्यवहारिक राजनीति के साथ जोड़ कर कदम बढ़ाये थे। अटलबिहारी बाजपेई के दौर में बीजेपी ने अपने तीनों विवादास्पद ऐजेंडे को दरकिनार कर जार्ज फर्नांडिस के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा बनना स्वीकार किया था। कांग्रेस ने 1979 में चौधरी चरण सिंह, 1990 में चंद्रशेखर तथा 1997 में देवेगौड़ा और गुजराल के साथ कदम बढ़ाये थे। लेकिन आज की स्थिति में वह (राहुल गांधी) सैध्दांतिक राजनीति को लेकर बीजेपी (नरेन्द्र मोदी) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (सरसंघचालक मोहन भागवत) से सीधे तौर पर लड़ाई लड़ रहे हैं। कांग्रेस (राहुल गांधी) की यह सैध्दांतिक राजनीतिक लड़ाई कांग्रेस की जगह बीजेपी और आरएसएस को मजबूत कर रही है क्योंकि बीजेपी और आरएसएस को सैद्धांतिक राजनीति को धर्म की चासनी में डुबोकर परोसने में महारत हासिल है। बीजेपी तो पिछले 11 बरस से आमजन से सरोकार रखने वाले मुद्दों को भी हिन्दुत्व के आवरण में लपेट कर आक्रामक तरीके से जनता के बीच परोस कर भरमा रही है। लेकिन चुनावी हिन्दुत्व की मियाद तभी तक है जब तक सहयोगी दलों की बैसाखी बीजेपी के पास है। सहयोगी दलों की बैसाखी के भरोसे ही बीजेपी मुंबई में अपना मेयर बना पायेगी।
लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन खास तौर पर कांग्रेस को ना तो नितीश कुमार की अहमियत का अह्सास था ना ही चंद्रबाबू नायडू की अहमियत का अह्सास था, ना ही एकनाथ शिंदे और ना ही चिराग पासवान की अहमियत का अह्सास था। आज भी कांग्रेस ने जिस रवैये को अख्तियार किया हुआ है उससे ना तो उध्व ठाकरे खुश हैं ना ही शरद पवार। बीएमएस में शिवसेना (उध्व ठाकरे) और कांग्रेस का गठबंधन नहीं हुआ जिसका दुष्परिणाम सामने है। बंगाल में बीजेपी और टीएमसी की सीधी लड़ाई है यहां पर फिलहाल सीपीएम और कांग्रेस हासिये पर है। ठीक इसी तरह तमिलनाडु में बीजेपी हासिये पर है। लेकिन असम में तो कांग्रेस और बीजेपी आमने सामने हैं तो क्या वाकई कांग्रेस बीजेपी को हराने की स्थिति में है ? कर्नाटक, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में जहां पारंपरिक रूप से हर 5 साल में सत्ता परिवर्तन होता चला आ रहा है। बंगाल में बीजेपी को टीएमसी ने हराया था। दिल्ली में बीजेपी को दो बार आम आदमी पार्टी ने हराया था। लेकिन मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा जहां पर सीधे-सीधे कांग्रेस और बीजेपी आमने सामने थे कांग्रेस अपने बूते तो बीजेपी को हरा नहीं पाई। सवाल यह है कि आखिर चुनाव लड़ने और चुनाव लड़ने की परिस्थितियों के बीच फंडामेंटल प्राब्लम है कहां पर ? आधारभूत दिक्कतें हैं कहां पर ? जो विपक्ष के भीतर सत्ता में आने के आत्मविश्वास को पनपने से रोकती है। और विपक्ष के इसी आत्मविश्वास की कमी का भरपूर फायदा बीजेपी उठाने से चूकती नहीं है।
लेकिन आज स्थितियां करवट ले रही हैं। छत्रपों के एक राज्य में ईडी के दफ्तर को राज्य की पुलिस घेर रही है तो दूसरे राज्य में ईडी के हाथ से फाइल छीन कर ले जाई जा रही है। कल तक जिस ईडी के नाम से कांपा जाता था आज वह खुद कांप रही है यानी ईडी का डर रफूचक्कर हो रहा है। लेकिन कांग्रेस सैध्दांतिक लड़ाई की जिद पर अड़ी हुई है। वही बीजेपी विचारधारा और मानसिकता परिवर्तित करने का दौर चलाकर सैध्दांतिक राजनीति का कलेवर बदलने पर तुली हुई है। वह चुनावी हिन्दुत्व को सरोकारी मुद्दों पर हावी करके देश के मिजाज को बदलने की दिशा में बढ़ चली है। इसलिए ना तो बहुसंख्यकवाद की परिस्थितियों, ना ही अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की बातें करके ना ही सिर्फ जनता के मुद्दों को उठाकर यानी मुद्दा आधारित राजनीति करके बीजेपी को हराया जा सकता है। बीजेपी को हराने के लिए इन सारे मुद्दों के साथ सामाजिक समीकरणों की सियासत करनी होगी। देश के मुद्दों के साथ जातिगत जनगणना के मुद्दे को लेकर लचीले तरीके से जनता के बीच जाना होगा। देश की परिस्थितियों के मुताबिक स्थानीय स्तर पर छत्रप पैदा करने होंगे। महाराष्ट्र में कुछ हुआ हो या ना हुआ हो इतना तो हो ही गया है कि बीजेपी की आंखों की किरकिरी बने देवेन्द्र फडणवीस का कद तो बढ़ गया है और आज की तारीख में अमित शाह की भी इतनी हैसियत नहीं है कि वह देवेन्द्र फडणवीस को हटाकर कोई पर्ची मुख्यमंत्री बना सके।
बिहार में नितीश कुमार को सत्ता से हटाने के लिए लालू यादव की विरासत सम्हालने वाले तेजस्वी यादव लड़ रहे थे लेकिन नितीश कुमार की असफलताओं पर सीधा निशाना साधने से बच भी रहे थे। लड़ाई नरेन्द्र मोदी की तरफ मोड़ दी गई। जिससे जनता में यही मैसेज गया कि नितीश कुमार से कोई दिक्कत नहीं है। नतीजा सबके सामने है। नितीश कुमार के कांधे पर सवार होकर बीजेपी से लेकर एलजेपी तक अपनी अपनी सीटों को बढ़ाते चले गये। उड़ीसा में नवीन पटनायक को निपटाने के लिए कैसा कुचक्र रचा गया सबके सामने है। सवाल अखिलेश यादव का है क्योंकि बंगाल के बाद उत्तर प्रदेश में चुनाव होना है। सवाल यह है कि क्या बंगाल चुनाव के बाद यूपी के चुनाव तक दिल्ली में मोदी की सत्ता को टिकाये रखेगा इंडिया गठबंधन यानी सत्ता परिवर्तन की कवायद को मुकम्मल अंजाम तक पहुंचाने की कोई कवायद नहीं होती है तो निश्चित तौर पर यह माना जायेगा कि जनता के बीच लड़ी जाने वाली लड़ाई का श्री गणेश 2029 में ही होगा। मोदी की जगह वैकल्पिक सरकार बनाने की लोकतांत्रिक कोशिशों को छोड़ कर रखना सरासर बेवकूफी ही कही जायेगी। लोकसभा के भीतर वैकल्पिक सरकार बनाने की कोशिश कहीं से भी गलत नहीं है। भारतीय संविधान कहता है कि कार्यकाल सत्ता का नहीं लोकसभा का होता है। ब्रिटेन जीता जागता उदाहरण है। जहां एक लोकसभा के अंदर कई प्रधानमंत्री आये और गये। वहां तो अस्थिरता तो नहीं हुई। लेकिन भारत के भीतर बीजेपी के नैरेटिव में फंस कर अगर इंडिया गठबंधन लोकप्रियता के डर से यदि राजनीतिक निर्णय ले रहे हैं तो तय मानिये कि जनता सीधे तौर पर विपक्ष पर ही ऊंगली उठाएगी।
हार्डकोर हिन्दुत्व बनाम साफ्ट हिन्दुत्व का खेल खेलकर बीजेपी ध्यान भटकाने से चूकती नहीं है। मुंबई में ठाकरे ने कुछ हद तक अपना वजूद बचा लिया है लेकिन क्या हिन्दी पट्टी में कांग्रेस अपना वजूद बचा पायेगी जो मंडल कमीशन के साथ अस्ताचल में चला गया है। उस पट्टी में ऊंगलियों में गिने जा सकने यानी सिंगल डिजिट में विधायक दिखते हैं। विधानसभा में विधायक मिल भी गये तो लोकसभा में निल बटा सन्नाटा जैसी स्थिति रहती है। आखिर क्यों ? सवाल यही है कि क्या कांग्रेस अपने अस्तित्व को बचाने की दिशा में बढ़ेगी ? मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात जैसे राज्यों में क्या कांग्रेस बीजेपी से मुकाबला करने की स्थिति में खुद को ला पायेगी ? इन सारे सवालों का जवाब ढूंढे बिना आज की तारीख में मोदी शाह का मुकाबला करना कांग्रेस के लिए बेमानी साबित होगा। वैसे देखा जाए तो मुकाबले में मोदी शाह नहीं बल्कि मुकाबले में तो वह परिस्थितियां हैं जिन परिस्थितियों से पार पाने के लिए कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन के सारे दलों को खास तौर पर हिन्दी पट्टी के दलों को (चाहे वह कभी भी इंडिया गठबंधन का हिस्सा रहे हों) उपयुक्त रणनीति बनाने के लिए साथ आना होगा। देखना होगा कौन बिल्ली के गले में घंटी बांधने आगे आता है ? जनता के विमर्श का कितना दबाव राजनीतिक दलों पर पड़ता है क्योंकि अंततः उस दबाव के सहारे सियासत के अंदर किसी भी प्रकार की राजनीतिक या व्यवस्था परिवर्तन जैसी बातों को अमलीजामा पहनाया जाता है।
महाराष्ट्र के नगरीय निकाय चुनावों ने अतीत के पन्नों को खोलकर रख दिया है। उन अतीत के पन्नों के आसरे वर्तमान और भविष्य की तस्वीर भी देखी जा सकती है। 1967 में जब पहली बार मुंबई कार्पोरेशन के चुनाव में बाला साहब ठाकरे ने दखल दी थी तो उस वक्त उन्होंने खुद को तानाशाह कहा था। उन्हें ना तो भैय्या पसंद थे ना ही लुंगी वाले पसंद थे तभी तो उन्होंने यह भी कहा था कि मैं चाहता हूं कि हर क्षेत्र में महाराष्ट्रियन का बोलबाला हो। 1967 यानी 60 बरस पहले प्रभाकर वैद्य ने अपने आर्टिकल में बाला साहब ठाकरे के उस व्यक्तव्य का जिक्र किया “हां मैं तानाशाह हूं। इतने शासकों की जरूरत क्या है। आज भारत को तो हिटलर की आवश्यकता है। भारत में लोकतंत्र क्यों होना चाहिए, यहां तो हमें हिटलर चाहिए” । उन्होंने तो यहां तक खुले तौर पर कहा कि “मतपेटी के माध्यम से हमेशा जनतंत्र अपने सही रूप में प्रगट नहीं हो पाता है। ठाकरे परिवार की 60 वर्षीय राजनीतिक यात्रा को भुलाया नहीं जा सकता है। मैं अपने विचार तब तक नहीं बदलूंगा जब तक एक नये तरीके से सुरक्षित जनतांत्रिक पध्दति के परिणाम नहीं निकलते जिसे मैं स्वीकार कर सकूं। हमारे देश में जनतंत्र की जड़ें ही अपनी जड़ को जमा नहीं पा रही है और जब तक जड़ जम नहीं पायेगी तब तक मेरी राय बहुत साफ है। मैं एक तानाशाह के तौर पर यहां मौजूद रहूंगा यह कहते हुए वे यहां तक कह गये कि इस देश को एक तानाशाह की जरूरत है और उनकी पार्टी सही रास्ते पर चल रही है। लाख जद्दोजहद करके उन्होंने मुंबई को महाराष्ट्र में रखा, गुजरात में जाने नहीं दिया। मुंबई की अर्थनीति पर हावी होने वाले गुजरातियों की अच्छी-खासी तादाद है और छत्रप अपनी राजनीति चमकाने के लिए इन्हीं से बसूली करते हैं.इसीलिए 2014 में प्रधानमंत्री बननेके बाद नरेन्द्र मोदी जब मुंबई और पूना के इलाके में पहुंचे तो खुलकर कहा कि यहां पर बसूली पार्टीज हैं। उनका ईशारा अविभाजित शिवसेना की ओर था।
4 जून 2025 की रात ने बीजेपी खासकर नरेन्द्र मोदी, अमित शाह और जेपी नड्डा को हिलाकर रख दिया था। कहते हैं कि उसी रात तय किया गया था कि कुछ भी करना पड़े अब किसी भी चुनाव को हारना नहीं है। विपक्ष को यह मौका कतई नहीं देना है कि वह एनडीए के भीतर सेंध लगाकर किसी को प्रधानमंत्री बना दे इसलिए हरहाल में एनडीए कुनबे की एकजुटता को बनाये रखना है। इंडिया गठबंधन को एनडीए से महज 1.5 करोड़ वोट कम मिले थे यानी इंडिया गठबंधन को 26 करोड़ 77 लाख वोट मिले थे जबकि एनडीए को 28 करोड़ 26 लाख वोट तथा 293 सीटें मिली थी। 400 पार का नारा लगाते – लगाते बीजेपी 240 सीट पर अटक गयी थी। अगर उस वक्त इंडिया गठबंधन ने या कहें कांग्रेस ने यदि सैध्दांतिक राजनीति को व्यवहारिक राजनीति के साथ जोड़ दिया होता और नितीश कुमार तथा चंद्रबाबू नायडू को प्राइम मिनिस्टर और डिप्टी प्राइम मिनिस्टर बना दिया होता तो आज बीजेपी (एनडीए) की नहीं इंडिया गठबंधन की सरकार होती। जनता तो उसी का जयगान करती है जो सत्ता में होता है।
2014 में तो बीजेपी या कहें मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत का अलाप किया था लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद लगता है उसने जरा सी लाइन बदलते हुए पहले छत्रप मुक्त स्टेटस की मुहिम छेड़ दी है। महाराष्ट्र और बिहार में तो उसने करीब – करीब छत्रपों को लाइन से लगा दिया है। आज की तारीख में बीजेपी या कहें गुजराती जोड़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती बंगाल की छत्रप ममता बनर्जी और तमिलनाडु में छत्रप स्टालिन हैं। ममता बनर्जी का फैसला तो अप्रैल-मई में हो जायेगा। पश्चिम बंगाल बीजेपी के लिए इसलिए भारी पड़ रहा है क्योंकि उसके पास यहां पर चुनाव आयोग के साथ महाराष्ट्र जैसा शिंदे और अजित पवार तथा बिहार जैसा नितीश कुमार नहीं है जिसके कांधे पर चढ़ कर ममता बनर्जी को निपटाया जा सके। फिर भी अगर बीजेपी बंगाल में ममता के पैर उखाड़ने में कामयाब हो जाती है तो फिर तय है कि तमिलनाडु में स्टालिन को भी वह उखाड़ फेंकने में कामयाब हो सकती है। फिर बचेगी कांग्रेस तो जिस लाइन पर कांग्रेस चल रही है उससे भले ही कांग्रेस वैचारिक रूप से जिंदा रहे लेकिन बतौर राजनीतिक पार्टी उसे नेस्तनाबूद करने में बीजेपी को इसलिए कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि अपनों की ही विभीषणगिरी से कांग्रेस खत्म हो जायेगी।
2024 के बाद से गवर्नेंस के तौर तरीकों ने देश में एक ऐसी परिस्थिति को जन्म दे दिया है कि लोकतंत्र की अंपायरिंग करने वाले ने खुद को ही एक खिलाड़ी के रूप में तब्दील कर लिया है। इलेक्शन कमिश्नर की नियुक्ति, एसआईआर का आना, नीचे से लेकर ऊपर तक की अदालतों के भीतर पालिटिकल मुद्दों का जाना, उन मुद्दों पर अदालतों का फैसला आना एक झटके में तमाम इंस्टीटयूशन, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के भीतर राजनीतिक दायरे में सिमटते हुए दिखाई दे रहे हैं। 4 जून 2024 को जो गुप्त फैसला लिया गया था उससे फिलहाल दिल्ली सल्तनत को कोई डिगाने की स्थिति में दिखाई दे नहीं रहा है। अब तो संघ भी बीजेपी (मोदी-शाह) शरणम् गच्छामि हो चला है और उस पर आखिरी मोहर 20 जनवरी 2026 को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की औपचारिक घोषणा होते ही लग जायेगी।
भारत की राजनीति मुख्यतः तीन मुद्दों पर चलती है। पहला मुद्दा तो यही है कि पैसा किसका खर्च हो रहा है ? दूसरा मुद्दा है उस खर्च किये गए पैसे से फायदा किसको हो रहा है ? तीसरा मुद्दा है इन सबके पीछे कोई मोटिवेशन है या नहीं है ? नोटबंदी के बाद से भारत की राजनीति के पारंपरिक तौर तरीके बदल गये। ईडी, सीबीआई, आईटी ने देश की तमाम राजनीति पार्टीज की फंडिंग पर रोक लगा दी है। सारा पैसा सत्ताधारी पार्टी की ओर डायवर्ट होने लगा है। तो सवाल यही है कि पैसा किसका आ रहा है ? उस पैसे से जीत किसको मिल रही है ? उस जीत से मुनाफा कौन कमा रहा है ? उस मुनाफे से कौन सा मोटिवेशन पैदा किया गया ? जब लोग 365 x 24 हिन्दू मुस्लिम के झूले में झूलते रहेंगे तो फिर काहे का चुनाव ? मध्यम तबके की हालत एक त्रासदी में तब्दील हो चुकी है। उसे अगर बिजनेस करना है तो पालिटिकल हफ्ता देना होगा। चाहे 1947 रहा हो या 2025 हो गरीबों के आर्थिक हालात एक जैसे ही हैं तब भी एक बड़ी संख्या भुखमरी में जी रही थी आज भी देश की 80 लाख आबादी सरकार के द्वारा दिए जा रहे 5 किलो मुफ्त अनाज पर जी रही है। मुंबई के भीतर का एक सच यह भी है कि अट्टालिकाओं के नीचे झोपड़ियां दफन की जा रही है, ताजा उदाहरण तो धारावी है ही । इस सियासत को बदलने के लिए क्या वही पार्लियामेंट चाहिए जहां रेंगना पड़ता है ? क्या वही विधानसभा चाहिए जहां कोई भी आवाज सुनी ही नहीं जाती है ? हकीकत तो यह है कि देश को जंजी नहीं, युवा नहीं, नौकरशाह नहीं, बिजनेस मैन नहीं यहां की राजनीति हांक रही है।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार





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