स्वच्छता पर सख्ती या छवि सुधार की कवायद ? पंचकूला नगर निगम के दावों पर उठते सवाल
219 रैंक थी पंचकूला की पिछले स्वच्छता सर्वेक्षण में
स्वच्छता पर सख्ती या छवि सुधार की कवायद ? पंचकूला नगर निगम के दावों पर उठते सवाल
पंचकूला को स्वच्छ और मॉडल सिटी बनाने के दावे एक बार फिर चर्चा में हैं। नगर निगम आयुक्त विनय कुमार द्वारा अलीपुर एमआरएफ सेंटर, झूरीवाला ट्रांसफर स्टेशन और सेक्टर-26 स्थित एस्पिरेशनल टॉयलेट का मंगलवार को फील्ड निरीक्षण यह संकेत देता है कि प्रशासन अब स्वच्छता को लेकर सख्त रुख अपनाना चाहता है। लेकिन सवाल यह है कि यह सक्रियता स्थायी सुधार की दिशा में है या गिरती साख को संभालने की कोशिश भर है।
पिछली स्वच्छता सर्वेक्षण में पंचकूला नगर निगम की रैंकिंग 219 तक पहुंचना प्रशासन के लिए बड़ा झटका माना गया। इसके बाद विपक्ष ही नहीं, आम जनता ने भी नगर निगम के अधिकारियों, इंजीनियरों और जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर सवाल उठाए। लोगों का सीधा तर्क था कि जब स्वच्छता पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, तो परिणाम इतने कमजोर क्यों रहे।
अलीपुर एमआरएफ सेंटर को ठोस कचरा प्रबंधन की रीढ़ बताया जा रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि अब तक न तो वहां तक पहुंच का रास्ता पूरी तरह तैयार है और न ही झूरीवाला ट्रांसफर स्टेशन का स्थानांतरण समय पर हो सका। निरीक्षण के दौरान आयुक्त ने इन कार्यों में तेजी के निर्देश जरूर दिए, पर यह भी सच है कि ये निर्देश पहले भी दिए जा चुके हैं। सवाल यह उठता है कि अगर योजनाएं समय पर लागू होतीं, तो आज झूरीवाला क्षेत्र कचरे के ढेर से जूझता क्यों?
इसी तरह, सेक्टर-26 का एस्पिरेशनल टॉयलेट कागजों में आधुनिक सुविधाओं से लैस परियोजना है, लेकिन जनता के लिए अभी तक पूरी तरह उपलब्ध नहीं हो पाया। स्वच्छ भारत मिशन के तहत बनी ऐसी योजनाएं तब तक प्रभावी नहीं मानी जा सकतीं, जब तक वे समय पर और नियमित रखरखाव के साथ जनता की सेवा में न आएं।
झूरीवाला ट्रांसफर स्टेशन पर एक सप्ताह में पूरी सफाई के निर्देश भी प्रशासन की गंभीरता दर्शाते हैं, लेकिन यह भी स्वीकार करना होगा कि यह कार्रवाई रैंकिंग गिरने और आलोचना बढ़ने के बाद तेज हुई है। यदि निगरानी पहले से मजबूत होती, तो हालात यहां तक नहीं पहुंचते।
अब सवाल भविष्य का है। जिस तरह से नगर निगम ने स्वच्छता रैंकिंग सुधारने के लिए अभी से प्रयास शुरू किए हैं, उससे उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले सर्वेक्षणों में पंचकूला की स्थिति बेहतर हो। लेकिन यह सुधार तभी टिकाऊ होगा, जब निरीक्षण सिर्फ औपचारिकता न रहकर जमीनी स्तर पर जवाबदेही, समयबद्ध कार्य और खर्च किए गए धन का स्पष्ट परिणाम दिखे। वरना स्वच्छता के दावे हर साल नए निरीक्षणों तक ही सीमित रह जाएंगे।





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