क्या इतिहास में ट्रंप ‘टैरिफ गुरु’ के रूप में याद किए जाएंगे?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर यूरोपीय देशों पर टैरिफ बढ़ाकर वैश्विक व्यापार को लेकर अपनी आक्रामक नीति का संकेत दे दिया है। यह कोई पहला मौका नहीं है जब ट्रंप ने टैरिफ को राजनीतिक और आर्थिक दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया हो। अपने दूसरे कार्यकाल में अब तक वे चीन, मैक्सिको, कनाडा और एशियाई देशों सहित कई राष्ट्रों पर मनमाने शुल्क लगा चुके हैं।
अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या इतिहास ट्रंप को एक ऐसे राष्ट्रपति के रूप में याद रखेगा, जिन्होंने कूटनीति और संवाद की जगह टैरिफ को प्राथमिक हथियार बनाया। उनका दूसरा कार्यकाल अगर इसी राह पर आगे बढ़ता है, तो संभव है कि उनकी पहचान ‘टैरिफ गुरु’ के रूप में दर्ज हो जाए।
विशेषज्ञ मानते हैं कि बार-बार टैरिफ बढ़ाने की नीति अल्पकालिक राजनीतिक लाभ तो दे सकती है, लेकिन इसका दीर्घकालिक असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और अमेरिका की साख पर नकारात्मक पड़ सकता है। यूरोपीय देशों के साथ व्यापारिक तनाव न केवल अमेरिकी उपभोक्ताओं पर महंगाई का बोझ बढ़ा सकता है, बल्कि मित्र राष्ट्रों के साथ रिश्तों में भी खटास पैदा कर सकता है।
एक शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सहयोग, संतुलन और संवाद के रास्ते से वैश्विक नेतृत्व को मजबूती दे। लेकिन ट्रंप की बार-बार की टैरिफ धमकियां यह संदेश देती हैं कि अमेरिका अब साझेदारी से ज्यादा दबाव की राजनीति पर भरोसा कर रहा है। यह रुख न केवल अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिका की छवि को कमजोर करता है, बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था को भी अस्थिर करता है।
इतिहास उन्हीं नेताओं को दूरदर्शी मानता है, जिन्होंने टकराव के बजाय समाधान को चुना। ट्रंप के सामने अब भी यह अवसर है कि वे यह साबित करें कि अमेरिका का नेतृत्व केवल आर्थिक ताकत दिखाने तक सीमित नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और संतुलन का भी प्रतीक है। अन्यथा आने वाले समय में उनकी पहचान विकास या कूटनीतिक उपलब्धियों से अधिक, टैरिफ की राजनीति तक सिमट कर रह सकती है।





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